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तत्वदर्शी महापुरुषो की तपस्थली उनके महाप्रयाण के बाद तीर्थ स्थली बन जाती है: नारद महराज
0 स्वामी विमलानंद की 44 वीं पुण्यतिथि पर भव्य भंडारे मे लाखो भक्तो ने ग्रहण किया प्रसाद
मीरजापुर।
छानबे विकास खंड अंतर्गत विजयपुर ग्राम स्थित झोरिया महादेवन (परमहंस आश्रम विजयपुर) मे स्वामी विमलानंद महाराज की 44 वीं पुण्यतिथि पर स्वामी विमलानंद जी की समाधि पर लाखो भक्तो ने शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया। आश्रम के शिव मंदिर, हनुमान मंदिर एवं स्वामी स्वामी वियानंद जी महाराज की समाधि सहित गुरु महाराज की धूनी को भव्य रूप से सजाया गया था, जहां श्रद्धालु भक्तो ने पहुंचकर समाधिष्ठ संतो और धूनी पर प्रनाम किया। ततपश्चात अटूट भंडारे मे प्रसाद ग्रहण किया।

प्रतिवर्ष 28 दिसंबर के दिन विमलानंद जी महाराज के पुण्यतिथि पर स्वामी अड़गड़ानंद जी महराज का यहां आगमन होता था, लेकिन बाहर होने के नाते उनका आगमन न हुआ। यद्यपि महराज जी के भंडारे मे भारी संख्या मे प्रसाद ग्रहण कर भक्तों ने स्वयं को कृतार्थ किया। मौसम की चुनौती स्वीकार करते हुए रविवार की सुबह से ही भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जोकि देर शाम तक चलता रहा। कई बार उनके अस्वस्थ होने की खबर भी प्रसारित की गई। महराज जी के शिष्य नारद बाबा, भुवनेश्वर महराज, प्रेम बाबा, नर्मदा शंकर ने ध्यान योग – योगासन के बारे मे विस्तार से जानकारी दी। भजन कीर्तन के माध्यम से भक्तों को तृप्त किया गया।

परमहंस आश्रम सक्तेषगढ के वरिष्ठतम संत नारद महराज ने कहाकि तत्वदर्शी महापुरुषो की तपस्थली उनके महाप्रयाण के बाद एक तीर्थ स्थली बन जाती है और ऐसे स्थल पर असीम ऊर्जा और भरपूर आध्यात्मिक शक्ति होती है। ऐसे स्थलो एवं तत्वदर्शी महापुरूषो का अनुशरण करने वाले मन क्रम वचन से तन मन धन से सेवा करे, तो निश्चित ही उनके दुख का अंत और सुख सहित आत्म कल्याण होगा।

नारद महाराज ने कहा कि गुरु की पहचान- गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः गुणरूपविहीनत्वात् गुरुरित्यभिधीयते। ‘गु’ कार से गुणातीत कहा जता है, ‘रु’ कार से रूपातीत कहा जता है। गुण और रूप से परे होने के कारण ही गुरु कहलाते हैं। समत्व भाव, इच्छाओं से मुक्त, अहंकार का अभाव, तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त, साक्षी भाव और अनासक्त भाव होता है।

इसलिए, भगवद्गीता का संदेश हमें यही सिखाता है कि हमें सत्त्व, रज और तम के प्रभावों से मुक्त होकर, अपने जीवन को एक साधना के रूप में अपनाकर, धीरे-धीरे गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ना चाहिए। यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और सच्ची मुक्ति का मार्ग है और इस मार्ग को सुगम करने के लिए ‘यथार्थ गीता’ मानव मात्र का धर्मशास्त्र है, जिसे पढकर और उस मार्ग पर चलकर मानव मात्र का कल्याण होगा।

इस अवसर पर भगवती सिंह, गिरधारी पाल, राजन, पन्नालाल पटेल, विक्कू अग्रहरि महराज, राजेंद्र प्रजापति, धनेश्वर सेठ, शिरीष अग्रहरि, बब्बू जायसवाल, राजू अग्रहरि आदि ने प्रसाद वितरण व्यवस्था संभाला।

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