0 विशेष: गुलाम गौस को पराजित कर हासिल किया रुस्तम-ए-हिंद का खिताब, 1954 में हिंद केसरी की उपाधि से हुए सम्मानित
कछवां, मीरजापुर।
भारतीय पारंपरिक कुश्ती के इतिहास में मल्ल शिरोमणि मंगला राय का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के जोगा मुसाहिब गांव में अक्टूबर 1916 में जन्मे मंगला राय ने अपनी पहलवानी प्रतिभा, कठिन परिश्रम और विशिष्ट दांव-पेचों के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उन्हें रुस्तम-ए-हिंद और हिंद केसरी जैसे खिताबों से जाना जाता है। उनकी उपलब्धियां आज भी पारंपरिक कुश्ती के इतिहास में प्रेरणादायी मानी जाती हैं।
मंगला राय की पहलवानी प्रतिभा की चर्चा उनके शुरुआती मुकाबलों से ही होने लगी थी। रंगून में उन्होंने फत्ते सिंह और ईशा नट जैसे पहलवानों को पराजित कर अपनी क्षमता का परिचय दिया। वर्ष 1933 में भारत लौटने के बाद इलाहाबाद के प्रसिद्ध पहलवान मुस्तफा से उनका मुकाबला हुआ। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मंगला राय ने अपने विशेष बहारल्ली दांव का इस्तेमाल करते हुए करीब पांच मिनट में मुस्तफा पहलवान को चित कर दिया। इस जीत ने उन्हें कुश्ती जगत में व्यापक पहचान दिलाई।
मंगला राय की प्रमुख उपलब्धियों में प्रसिद्ध पहलवान गुलाम गौस को पराजित करना शामिल है। गुलाम गौस को फख्र-ए-हिंद और रुस्तम-ए-पाकिस्तान जैसे खिताबों से भी जोड़ा जाता है। उन्हें हराने के बाद मंगला राय को रुस्तम-ए-हिंद की उपाधि मिली। वर्ष 1954 में उन्हें हिंद केसरी की उपाधि से भी सम्मानित किए जाने का उल्लेख मिलता है। इन उपलब्धियों ने उन्हें भारतीय पारंपरिक कुश्ती के प्रमुख पहलवानों में स्थापित किया।
मंगला राय की सफलता के पीछे कठोर व्यायाम और नियमित अभ्यास की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके अभ्यास में हजारों बैठकें और दंड-बैठकें शामिल थीं। कुश्ती की तकनीक को बेहतर बनाने के लिए वह अनुभवी पहलवानों के साथ लगातार अभ्यास करते थे। उनकी शारीरिक क्षमता, दांव-पेचों की कुशलता और अनुशासित जीवनशैली उन्हें दूसरे पहलवानों से अलग पहचान दिलाती थी।
मंगला राय की उपलब्धियां केवल अखाड़े में जीत हासिल करने तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने अनेक पहलवानों को प्रशिक्षण दिया और उनके रहने-खाने की व्यवस्था में भी सहयोग किया। उनके प्रमुख शिष्यों में दुखहरण झा, सुखदेव पहलवान, मोहन चौबे, कमला राय, ब्रह्मचारी राय, मथुरा राय और बलेश्वर पहलवान के नाम शामिल हैं। वह गुरु की जिम्मेदारी को केवल कुश्ती सिखाने तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि शिष्यों के व्यक्तिगत विकास और कल्याण पर भी ध्यान देते थे।
मंगला राय ने वर्ष 1963 में मेहरुद्दीन के साथ अपना अंतिम चर्चित मुकाबला लड़ा और इसके बाद पहलवानी से संन्यास ले लिया। 24 जून 1976 को वाराणसी में उनका निधन हो गया। उनके नाम पर कुश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम बना हुआ है। मंगला राय का जीवन बताता है कि कठिन परिश्रम, अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से खेल जगत में स्थायी पहचान बनाई जा सकती है।
मंगला राय स्मारक राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता के लिए पहलवानो की आमद शुरू
कछवा, मीरजापुर। सोमवार, 26 अक्टूबर को सत्यनारायण सिंह खेल संस्थान में दिल्ली, हरियाणा, रेलवे, उत्तर प्रदेश पुलिस, सीआरपीएफ, उत्तर प्रदेश के खेल हास्टलों तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पहलवानो का पहुंचना शुरु हो गया। 12 बजे दोपहर से पहलवानों का नाप तौल शुरू हुआ। सायं सात बजे से कुश्ती प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ।





