0 नागपंचमी से शुरू हुई थी कजली की तैयारी, नौ दिन तक जरई की पूजा-अर्चना के बाद विधि-विधान से किया विसर्जन
कछवा, मीरजापुर। सोमवार को कजली का त्योहार धूमधाम और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। महिलाओं और युवतियों ने पारंपरिक तरीके से जरई डुबोकर कजली की रस्म पूरी की। सुबह से ही अपने अपने गांव के तालाबों महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। महिलाओं ने गीत गाते हुए जरई का विसर्जन किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
कजली पर्व को लेकर नागपंचमी के दिन से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। मान्यता के अनुसार नागपंचमी के दिन तालाब अथवा गंगा जी से मिट्टी लाकर उसमें जरई बोई जाती है। इसके बाद कई दिनों तक महिलाएं और युवतियां इसकी पूजा-अर्चना करती हैं। सोमवार को विधि-विधान से जरई को तालाब और गंगा के जल में विसर्जित कर कजली पर्व का समापन किया गया।
विसर्जन के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक कजली गीत गाए। इससे घाटों और तालाबों के आसपास का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो गया। युवतियां समूह में पहुंचीं और एक-दूसरे को कजली की शुभकामनाएं दीं। कई स्थानों पर परिवार की महिलाएं एक साथ जरई लेकर विसर्जन के लिए पहुंचीं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कजली पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी की युवतियों को कजली की परंपरा और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताया। लोगों का कहना है कि आधुनिक दौर में भी इस तरह के पारंपरिक पर्व लोक संस्कृति और आपसी भाईचारे को जीवंत बनाए हुए हैं।
बीती रात को कजली के उपलक्ष्य में रातजगा कर महिलाओं और युवतियों ने रातभर कजली गीत गाए। रातजगा के इस कार्यक्रम से क्षेत्र में कजली की धूम रही।





